श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.12

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

किं प्रमत्तस्य बहुभिः परोक्षैर्हायनैरिह।

वरं मुहूर्तं विदितं घटेत२ श्रेयसे यतः॥ १२

kiṃ pramattasya bahubhiḥ parokṣairhāyanairiha|

varaṃ muhūrtaṃ viditaṃ ghaṭeta śreyase yataḥ|| 12

अर्थ

अपने कल्याण-साधनकी ओरसे असावधान रहनेवाले पुरुषकी वर्षों लम्बी आयु भी अनजानमें ही व्यर्थ बीत जाती है। उससे क्या लाभ! सावधानीसे ज्ञानपूर्वक बितायी हुई घड़ी, दो घड़ी भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके द्वारा अपने कल्याणकी चेष्टा तो की जा सकती है॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—यतते।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 182)

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