उनकी सारी उम्र यों ही बीत जाती है। उनकी रात नींद या स्त्री-प्रसंगसे कटती है और दिन धनकी हाय-हाय या कुटुम्बियोंके भरण-पोषणमें समाप्त हो जाता है॥ ३॥✎ 115
निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः।
दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा॥ ३
उनकी सारी उम्र यों ही बीत जाती है। उनकी रात नींद या स्त्री-प्रसंगसे कटती है और दिन धनकी हाय-हाय या कुटुम्बियोंके भरण-पोषणमें समाप्त हो जाता है॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 181) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/1/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)