॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.1.4
dehāpatyakalatrādiṣvātmasainyeṣvasatsvapi |
teṣāṃ pramatto nidhanaṃ paśyannapi na paśyati|| 4
अर्थ
संसारमें जिन्हें अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, असत् हैं; परन्तु जीव उनके मोहमें ऐसा पागल-सा हो जाता है कि रात-दिन उनको मृत्युका ग्रास होते देखकर भी चेतता नहीं॥ ४॥✎ 115
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—सौख्येष्व०।