श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.5

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवानीश्‍वरो हरिः।

श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्‍च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम्३॥ ५

tasmādbhārata sarvātmā bhagavānīśvaro hariḥ|

śrotavyaḥ kīrtitavyaśca smartavyaścecchatābhayam|| 5

अर्थ

इसलिये परीक्षित्! जो अभय पदको प्राप्त करना चाहता है, उसे तो सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णकी ही लीलाओंका श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये॥ ५॥✎ 115

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—व्यः स्वेच्छया विभुः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 181)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #115 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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