श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.6

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

एतावान् सांख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया।

जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः॥ ६

etāvān sāṃkhyayogābhyāṃ svadharmapariniṣṭhayā|

janmalābhaḥ paraḥ puṃsāmante nārāyaṇasmṛtiḥ|| 6

अर्थ

मनुष्य-जन्मका यही—इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो—ज्ञानसे, भक्तिसे अथवा अपने धर्मकी निष्ठासे जीवनको ऐसा बना लिया जाय कि मृत्युके समय भगवान्‌की स्मृति अवश्य बनी रहे॥ ६॥✎ 115

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #115 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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