श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.33

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

नद्योऽस्य नाड्योऽथ तनूरुहाणि

महीरुहा विश्‍वतनोर्नृपेन्द्र।

अनन्तवीर्यः श्‍वसितं मातरिश्वा

गतिर्वयः कर्म गुणप्रवाहः॥ ३३

nadyo'sya nāḍyo'tha tanūruhāṇi

mahīruhā viśvatanornṛpendra|

anantavīryaḥ śvasitaṃ mātariśvā

gatirvayaḥ karma guṇapravāhaḥ|| 33

अर्थ

राजन्! विश्‍वमूर्ति विराट् पुरुषकी नाड़ियाँ नदियाँ हैं। वृक्ष रोम हैं। परम प्रबल वायु श्वास है। काल उनकी चाल है और गुणोंका चक्कर चलाते रहना ही उनका कर्म है॥ ३३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें