श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.34

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

ईशस्य केशान् विदुरम्बुवाहान्

वासस्तु सन्ध्यां कुरुवर्य भूम्नः।

अव्यक्तमाहुर्हृदयं मनश्‍च

स चन्द्रमाः सर्वविकारकोशः॥ ३४

īśasya keśān vidurambuvāhān

vāsastu sandhyāṃ kuruvarya bhūmnaḥ|

avyaktamāhurhṛdayaṃ manaśca

sa candramāḥ sarvavikārakośaḥ|| 34

अर्थ

परीक्षित्! बादलोंको उनके केश मानते हैं। सन्ध्या उन अनन्तका वस्त्र है। महात्माओंने अव्यक्त (मूलप्रकृति)-को ही उनका हृदय बतलाया है और सब विकारोंका खजाना उनका मन चन्द्रमा कहा गया है॥ ३४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें