॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.23
वस्तुनो मृदुकाठिन्यलघुगुर्वोष्णशीतताम्।
जिघृक्षतस्त्वङ् निर्भिन्ना तस्यां रोममहीरुहाः।
तत्र चान्तर्बहिर्वातस्त्वचा लब्धगुणो वृतः॥ २३
vastuno mṛdukāṭhinyalaghugurvoṣṇaśītatām|
jighṛkṣatastvaṅ nirbhinnā tasyāṃ romamahīruhāḥ|
tatra cāntarbahirvātastvacā labdhaguṇo vṛtaḥ|| 23
अर्थ
जब उन्होंने वस्तुओंकी कोमलता, कठिनता, हलकापन, भारीपन, उष्णता और शीतलता आदि जाननी चाही तब उनके शरीरमें चर्म प्रकट हुआ। पृथ्वीमेंसे जैसे वृक्ष निकल आते हैं, उसी प्रकार उस चर्ममें रोएँ पैदा हुए और उसके भीतर-बाहर रहनेवाला वायु भी प्रकट हो गया। स्पर्श ग्रहण करनेवाली त्वचा-इन्द्रिय भी साथ-ही-साथ शरीरमें चारों ओर लिपट गयी और उससे उन्हें स्पर्शका अनुभव होने लगा॥ २३॥