श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.24

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

हस्तौ रुरुहतुस्तस्य नानाकर्मचिकीर्षया।

तयोस्तु बलमिन्द्रश्‍च४ आदानमुभयाश्रयम्॥ २४

hastau ruruhatustasya nānākarmacikīrṣayā|

tayostu balamindraśca ādānamubhayāśrayam|| 24

अर्थ

जब उन्हें अनेकों प्रकारके कर्म करनेकी इच्छा हुई, तब उनके हाथ उग आये। उन हाथोंमें ग्रहण करनेकी शक्ति हस्तेन्द्रिय तथा उनके अधिदेवता इन्द्र प्रकट हुए और दोनोंके आश्रयसे होनेवाला ग्रहणरूप कर्म भी प्रकट हो गया॥ २४॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—बलवानिन्द्र आदा०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 230)

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