श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.25

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

गतिं जिगीषतः पादौ रुरुहातेऽभिकामिकाम्।

पद‍्भ्यां यज्ञः स्वयं हव्यं कर्मभिः क्रियते नृभिः१॥ २५

gatiṃ jigīṣataḥ pādau ruruhāte'bhikāmikām|

padbhyāṃ yajñaḥ svayaṃ havyaṃ karmabhiḥ kriyate nṛbhiḥ|| 25

अर्थ

जब उन्हें अभीष्ट स्थानपर जानेकी इच्छा हुई, तब उनके शरीरमें पैर उग आये। चरणोंके साथ ही चरण-इन्द्रियके अधिष्ठातारूपमें वहाँ स्वयं यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु स्थित हो गये और उन्हींमें चलनारूप कर्म प्रकट हुआ। मनुष्य इसी चरणेन्द्रियसे चलकर यज्ञ-सामग्री एकत्र करते हैं॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—त्रिभिः।

    (मुद्रित पृष्ठ 231)

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