और जो बुद्धिमान् पुरुष है—वह चाहे निष्काम हो, समस्त कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्ष चाहता हो—उसे तो तीव्र भक्तियोगके द्वारा केवल पुरुषोत्तम भगवान्की ही आराधना करनी चाहिये॥ १०॥✎ 122123124125126128612871288
अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ १०
और जो बुद्धिमान् पुरुष है—वह चाहे निष्काम हो, समस्त कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्ष चाहता हो—उसे तो तीव्र भक्तियोगके द्वारा केवल पुरुषोत्तम भगवान्की ही आराधना करनी चाहिये॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.3.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 193) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (8)