श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.11

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एतावानेव यजतामिह निःश्रेयसोदयः।

भगवत्यचलो भावो यद् भागवतसङ्गतः॥ ११

etāvāneva yajatāmiha niḥśreyasodayaḥ|

bhagavatyacalo bhāvo yad bhāgavatasaṅgataḥ|| 11

अर्थ

जितने भी उपासक हैं, उनका सबसे बड़ा हित इसीमें है कि वे भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका संग करके भगवान्‌में अविचल प्रेम प्राप्त कर लें॥ ११॥✎ 122 123 124 125 126 1286 1287 1288

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (8)
  • #122 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #123 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #124 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #125 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #126 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णु-भगवान् की, → विष्णु-भगवान्‌की,
  • #1286 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिको, → निऋर्ऋतिको,
  • #1287 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिको, → निर्ऋतिको,
  • #1288 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विष्णु-भगवान्‌की, → विष्णुभगवान्‌की,

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