taravaḥ kiṃ na jīvanti bhastrāḥ kiṃ na śvasantyuta|
na khādanti na mehanti kiṃ grāmapaśavo'pare|| 18
अर्थ
क्या वृक्ष नहीं जीते? क्या लुहारकी धौंकनी साँस नहीं लेती? गाँवके अन्य पालतू पशु क्या मनुष्य—पशुकी ही तरह खाते-पीते या मैथुन नहीं करते?॥ १८॥✎ 127128
तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्वसन्त्युत।
न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे॥ १८
क्या वृक्ष नहीं जीते? क्या लुहारकी धौंकनी साँस नहीं लेती? गाँवके अन्य पालतू पशु क्या मनुष्य—पशुकी ही तरह खाते-पीते या मैथुन नहीं करते?॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.3.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 194) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)