परीक्षित्ने पूछा—भगवत्स्वरूप मुनिवर! आप परम पवित्र और सर्वज्ञ हैं। आपने जो कुछ कहा है, वह सत्य एवं उचित है। आप ज्यों-ज्यों भगवान्की कथा कहते जा रहे हैं, त्यों-त्यों मेरे अज्ञानका परदा फटता जा रहा है॥ ५॥✎ 133
समीचीनं वचो ब्रह्मन् सर्वज्ञस्य तवानघ।
तमो विशीर्यते मह्यं हरेः कथयतः कथाम्॥ ५
परीक्षित्ने पूछा—भगवत्स्वरूप मुनिवर! आप परम पवित्र और सर्वज्ञ हैं। आपने जो कुछ कहा है, वह सत्य एवं उचित है। आप ज्यों-ज्यों भगवान्की कथा कहते जा रहे हैं, त्यों-त्यों मेरे अज्ञानका परदा फटता जा रहा है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.4.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 196) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/4/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)