मैं आपसे फिर भी यह जानना चाहता हूँ कि भगवान् अपनी मायासे इस संसारकी सृष्टि कैसे करते हैं। इस संसारकी रचना तो इतनी रहस्यमयी है कि ब्रह्मादि समर्थ लोकपाल भी इसके समझनेमें भूल कर बैठते हैं॥ ६॥✎ 133
भूय एव विवित्सामि भगवानात्ममायया।
यथेदं सृजते विश्वं दुर्विभाव्यमधीश्वरैः॥ ६
मैं आपसे फिर भी यह जानना चाहता हूँ कि भगवान् अपनी मायासे इस संसारकी सृष्टि कैसे करते हैं। इस संसारकी रचना तो इतनी रहस्यमयी है कि ब्रह्मादि समर्थ लोकपाल भी इसके समझनेमें भूल कर बैठते हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.4.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 196) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/4/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)