श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.7

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यथा गोपायति विभुर्यथा संयच्छते पुनः।

यां यां शक्तिमुपाश्रित्य पुरुशक्तिः परः पुमान्।

आत्मानं क्रीडयन् क्रीडन् करोति विकरोति च॥ ७

yathā gopāyati vibhuryathā saṃyacchate punaḥ|

yāṃ yāṃ śaktimupāśritya puruśaktiḥ paraḥ pumān|

ātmānaṃ krīḍayan krīḍan karoti vikaroti ca|| 7

अर्थ

भगवान् कैसे इस विश्‍वकी रक्षा और फिर संहार करते हैं? अनन्तशक्ति परमात्मा किन-किन शक्तियोंका आश्रय लेकर अपने-आपको ही खिलौने बनाकर खेलते हैं? वे बच्चोंके बनाये हुए घरौंदोंकी तरह ब्रह्माण्डोंको कैसे बनाते हैं और फिर किस प्रकार बात-की-बातमें मिटा देते हैं?॥ ७॥✎ 133

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #133 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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