श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.9

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यथा गुणांस्तु प्रकृतेर्युगपत् क्रमशोऽपि वा।

बिभर्ति भूरिशस्त्वेकः कुर्वन् कर्माणि जन्मभिः॥ ९

yathā guṇāṃstu prakṛteryugapat kramaśo'pi vā|

bibharti bhūriśastvekaḥ kurvan karmāṇi janmabhiḥ|| 9

अर्थ

भगवान् तो अकेले ही हैं। वे बहुत-से कर्म करनेके लिये पुरुषरूपसे प्रकृतिके विभिन्‍न गुणोंको एक साथ ही धारण करते हैं अथवा अनेकों अवतार ग्रहण करके उन्हें क्रमशः धारण करते हैं॥ ९॥✎ 133

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #133 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें