श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.14

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

द्रव्यं कर्म च कालश्‍च स्वभावो जीव एव च।

वासुदेवात्परो ब्रह्मन्‍न चान्योऽर्थोऽस्ति तत्त्वतः॥ १४

dravyaṃ karma ca kālaśca svabhāvo jīva eva ca|

vāsudevātparo brahmanna cānyo'rtho'sti tattvataḥ|| 14

अर्थ

भगवत्स्वरूप नारद! द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव—वास्तवमें भगवान्‌से भिन्‍न दूसरी कोई भी वस्तु नहीं है॥ १४॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

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