श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.23

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

महतस्तु विकुर्वाणाद्रजःसत्त्वोपबृंहितात्।

तमःप्रधानस्त्वभवद् द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः॥ २३

mahatastu vikurvāṇādrajaḥsattvopabṛṃhitāt|

tamaḥpradhānastvabhavad dravyajñānakriyātmakaḥ|| 23

अर्थ

रजोगुण और सत्त्वगुणकी वृद्धि होनेपर महत्तत्त्वका जो विकार हुआ, उससे ज्ञान, क्रिया और द्रव्यरूप तमःप्रधान विकार हुआ॥ २३॥✎ 137 138

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #137 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #138 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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