काल, कर्म और स्वभावसे वायुमें भी विकार हुआ। उससे तेजकी उत्पत्ति हुई। इसका प्रधान गुण रूप है। साथ ही इसके कारण आकाश और वायुके गुण शब्द एवं स्पर्श भी इसमें हैं॥ २७॥✎ 137138
वायोरपि विकुर्वाणात् कालकर्मस्वभावतः।
उदपद्यत तेजो वै रूपवत् स्पर्शशब्दवत्॥ २७
काल, कर्म और स्वभावसे वायुमें भी विकार हुआ। उससे तेजकी उत्पत्ति हुई। इसका प्रधान गुण रूप है। साथ ही इसके कारण आकाश और वायुके गुण शब्द एवं स्पर्श भी इसमें हैं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 201) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/5/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)