मुनिवर! जो कुछ मनुष्यकी क्रिया और संकल्पसे बनता है, उससे वह परे है और अमृत एवं अभयपद (मोक्ष)-का स्वामी है। यही कारण है कि कोई भी उसकी महिमाका पार नहीं पा सकता॥ १७॥✎ 1992
सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात्।
महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः॥ १७
मुनिवर! जो कुछ मनुष्यकी क्रिया और संकल्पसे बनता है, उससे वह परे है और अमृत एवं अभयपद (मोक्ष)-का स्वामी है। यही कारण है कि कोई भी उसकी महिमाका पार नहीं पा सकता॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.6.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 205) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/6/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1992 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): (अशंमात्र) → (अंशमात्र)