श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.35

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां

भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम्।

यो१ ह्यात्ममायाविभवं स्म पर्यगाद्

यथा नभः स्वान्तमथापरे कुतः॥ ३५

nato'smyahaṃ taccaraṇaṃ samīyuṣāṃ

bhavacchidaṃ svastyayanaṃ sumaṅgalam|

yo hyātmamāyāvibhavaṃ sma paryagād

yathā nabhaḥ svāntamathāpare kutaḥ|| 35

अर्थ

(क्योंकि वे तो एकमात्र भक्तिसे ही प्राप्त होते हैं।) मैं तो परम मंगलमय एवं शरण आये हुए भक्तोंको जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले परम कल्याणस्वरूप भगवान्‌के चरणोंको ही नमस्कार करता हूँ। उनकी मायाकी शक्ति अपार है; जैसे आकाश अपने अन्तको नहीं जानता, वैसे ही वे भी अपनी महिमाका विस्तार नहीं जानते। ऐसी स्थितिमें दूसरे तो उसका पार पा ही कैसे सकते हैं?॥ ३५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यस्त्वात्ममायाविभवं स्वयं गतो यथा।

    (मुद्रित पृष्ठ 207)

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