॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.6.36
नाहं न यूयं यदृतां गतिं विदु-
र्न वामदेवः किमुतापरे सुराः।
तन्मायया मोहितबुद्धयस्त्विदं
विनिर्मितं चा२त्मसमं विचक्ष्महे॥ ३६
nāhaṃ na yūyaṃ yadṛtāṃ gatiṃ vidu-
rna vāmadevaḥ kimutāpare surāḥ|
tanmāyayā mohitabuddhayastvidaṃ
vinirmitaṃ cātmasamaṃ vicakṣmahe|| 36
अर्थ
मैं, मेरे पुत्र तुम लोग और शंकरजी भी उनके सत्यस्वरूपको नहीं जानते; तब दूसरे देवता तो उन्हें जान ही कैसे सकते हैं। हम सब इस प्रकार मोहित हो रहे हैं कि उनकी मायाके द्वारा रचे हुए जगत्को भी ठीक-ठीक नहीं समझ सकते, अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार ही अटकल लगाते हैं॥ ३६॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—त्वात्म०।