॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.6.39
विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम्।
सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम्॥ ३९
viśuddhaṃ kevalaṃ jñānaṃ pratyak samyagavasthitam|
satyaṃ pūrṇamanādyantaṃ nirguṇaṃ nityamadvayam|| 39
अर्थ
वे मायाके लेशसे रहित, केवल ज्ञानस्वरूप हैं और अन्तरात्माके रूपमें एकरस स्थित हैं। वे तीनों कालमें सत्य एवं परिपूर्ण हैं; न उनका आदि है न अन्त। वे तीनों गुणोंसे रहित, सनातन एवं अद्वितीय हैं॥ ३९॥