श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.38

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः३।

आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं संयच्छति४ च पाति च॥ ३८

sa eṣa ādyaḥ puruṣaḥ kalpe kalpe sṛjatyajaḥ|

ātmā''tmanyātmanā''tmānaṃ saṃyacchati ca pāti ca|| 38

अर्थ

वे अजन्मा एवं पुरुषोत्तम हैं। प्रत्येक कल्पमें वे स्वयं अपने-आपमें अपने-आपकी ही सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार कर लेते हैं॥ ३८॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—ऽसृजत्प्रजाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 207)
  2. ४

    प्रा० पा०—समं गच्छति पाति।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 207)

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