श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.41

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य

कालः स्वभावः सदसन्मनश्‍च।

द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि

विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः॥ ४१

ādyo'vatāraḥ puruṣaḥ parasya

kālaḥ svabhāvaḥ sadasanmanaśca|

dravyaṃ vikāro guṇa indriyāṇi

virāṭ svarāṭ sthāsnu cariṣṇu bhūmnaḥ|| 41

अर्थ

परमात्माका पहला अवतार विराट् पुरुष है; उसके सिवा काल, स्वभाव, कार्य, कारण, मन, पंचभूत, अहंकार, तीनों गुण, इन्द्रियाँ, ब्रह्माण्ड-शरीर, उसका अभिमानी, स्थावर और जंगम जीव—सब-के-सब उन अनन्तभगवान्‌के ही रूप हैं ॥ ४१॥✎ 1292 1952

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1292 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अनन्त-भगवान्‌के → अनन्तभगवान्‌के
  • #1952 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): भगवत्त्वरूप → भगवत्स्वरूप

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