श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.7

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अपां वीर्यस्य सर्गस्य पर्जन्यस्य प्रजापतेः।

पुंसः शिश्न उपस्थस्तु प्रजात्यानन्दनिर्वृतेः॥ ७

apāṃ vīryasya sargasya parjanyasya prajāpateḥ|

puṃsaḥ śiśna upasthastu prajātyānandanirvṛteḥ|| 7

अर्थ

विराट् पुरुषका लिंग जल, वीर्य, सृष्टि, मेघ और प्रजापतिका आधार है तथा उनकी जननेन्द्रिय मैथुनजनित आनन्दका उद्गम है॥ ७॥✎ 1290 1291

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1290 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1291 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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