श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.8

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पायुर्यमस्य मित्रस्य परिमोक्षस्य नारद।

हिंसाया निर्ऋतेर्मृत्योर्निरयस्य गुदः स्मृतः॥ ८ ✎ 996 997

pāyuryamasya mitrasya parimokṣasya nārada|

hiṃsāyā nir:ṛtermṛtyornirayasya gudaḥ smṛtaḥ|| 8

अर्थ

नारदजी! विराट् पुरुषकी पायु-इन्द्रिय यम, मित्र और मलत्यागका तथा गुदाद्वार हिंसा, निर्ऋति, मृत्यु और नरकका उत्पत्तिस्थान है॥ ८॥✎ 1290 1291

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #996 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तेर्मृत्योर्निरयस्य → निऋर्ऋतेर्मृत्योर्निरयस्य
  • #997 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतेर्मृत्योर्निरयस्य → निर्ऋतेर्मृत्योर्निरयस्य
  • #1290 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1291 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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