श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.10

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनु-

र्यो वै चचार समदृग् जडयोगचर्याम्।

यत्पारमहंस्यमृषयः पदमामनन्ति

स्वस्थः प्रशान्तकरणः परिमुक्तसङ्गः॥ १०

nābherasāvṛṣabha āsa sudevisūnu-

ryo vai cacāra samadṛg jaḍayogacaryām|

yatpāramahaṃsyamṛṣayaḥ padamāmananti

svasthaḥ praśāntakaraṇaḥ parimuktasaṅgaḥ|| 10

अर्थ

राजा नाभिकी पत्‍नी सुदेवीके गर्भसे भगवान्‌ने ऋषभदेवके रूपमें जन्म लिया। इस अवतारमें समस्त आसक्तियोंसे रहित रहकर, अपनी इन्द्रियों और मनको अत्यन्त शान्त करके एवं अपने स्वरूपमें स्थित होकर समदर्शीके रूपमें उन्होंने जड़ोंकी भाँति योगचर्याका आचरण किया। इस स्थितिको महर्षिलोग परमहंसपद अथवा अवधूतचर्या कहते हैं॥ १०॥✎ 150

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #150 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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