महाभाग्यवान् शुकदेवजी! आप मुझे ऐसा उपदेश कीजिये कि मैं अपने आसक्तिरहित मनको सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके अपना शरीर छोड़ सकूँ॥ ३॥✎ 165
कथयस्व महाभाग यथाहमखिलात्मनि।
कृष्णे निवेश्य निःसङ्गं मनस्त्यक्ष्ये कलेवरम्॥ ३
महाभाग्यवान् शुकदेवजी! आप मुझे ऐसा उपदेश कीजिये कि मैं अपने आसक्तिरहित मनको सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके अपना शरीर छोड़ सकूँ॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 218) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)