जिसका हृदय शुद्ध हो जाता है, वह श्रीकृष्णके चरणकमलोंको एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ता—जैसे मार्गके समस्त क्लेशोंसे छूटकर घर आया हुआ पथिक अपने घरको नहीं छोड़ता॥ ६॥
धौतात्मा पुरुषः कृष्णपादमूलं न मुञ्चति।
मुक्त सर्वपरिक्लेशः पान्थः स्वशरणं यथा॥ ६
जिसका हृदय शुद्ध हो जाता है, वह श्रीकृष्णके चरणकमलोंको एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ता—जैसे मार्गके समस्त क्लेशोंसे छूटकर घर आया हुआ पथिक अपने घरको नहीं छोड़ता॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 219) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/6/