भगवन्! जीवका पंचभूतोंके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर भी इसका शरीर पंचभूतोंसे ही बनता है। तो क्या स्वभावसे ही ऐसा होता है, अथवा किसी कारणवश—आप इस बातका मर्म पूर्णरीतिसे जानते हैं॥ ७॥✎ 166
यदधातुमतो ब्रह्मन् देहारम्भोऽस्य धातुभिः।
यदृच्छया हेतुना वा भवन्तो जानते यथा॥ ७
भगवन्! जीवका पंचभूतोंके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर भी इसका शरीर पंचभूतोंसे ही बनता है। तो क्या स्वभावसे ही ऐसा होता है, अथवा किसी कारणवश—आप इस बातका मर्म पूर्णरीतिसे जानते हैं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 219) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)