तुम उस समय सृष्टिरचनाका कर्म करनेमें किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे। इसीसे मैंने तुम्हें तपस्या करनेकी आज्ञा दी थी। क्योंकि निष्पाप! तपस्या मेरा हृदय है और मैं स्वयं तपस्याका आत्मा हूँ॥ २२॥
प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते।
तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ॥ २२
तुम उस समय सृष्टिरचनाका कर्म करनेमें किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे। इसीसे मैंने तुम्हें तपस्या करनेकी आज्ञा दी थी। क्योंकि निष्पाप! तपस्या मेरा हृदय है और मैं स्वयं तपस्याका आत्मा हूँ॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 225) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/9/22/