श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.3

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः।

रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम्॥ ३

yarhi vāva mahimni sve parasmin kālamāyayoḥ|

rameta gatasammohastyaktvodāste tadobhayam|| 3

अर्थ

किन्तु जब यह गुणोंको क्षुब्ध करनेवाले काल और मोह उत्पन्‍न करनेवाली माया—इन दोनोंसे परे अपने अनन्त स्वरूपमें मोहरहित होकर रमण करने लगता है—आत्माराम हो जाता है; तब यह ‘मैं, मेरा’ का भाव छोड़कर पूर्ण उदासीन—गुणातीत हो जाता है॥ ३॥ ब्रह्माजीकी निष्कपट तपस्यासे प्रसन्‍न होकर भगवान्‌ने उन्हें अपने रूपका दर्शन कराया और आत्म-तत्त्वके ज्ञानके लिये उन्हें परम सत्य परमार्थ वस्तुका उपदेश किया (वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ)॥ ४॥ ✎ 171

यह व्याख्या श्लोक 2.9.3 से 2.9.4 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #171 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें