श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.4

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवानृतम्।

ब्रह्मणे दर्शयन् रूपमव्यलीकव्रतादृतः॥ ४

ātmatattvaviśuddhyarthaṃ yadāha bhagavānṛtam|

brahmaṇe darśayan rūpamavyalīkavratādṛtaḥ|| 4

अर्थ

ब्रह्माजीकी निष्कपट तपस्यासे प्रसन्‍न होकर भगवान्‌ने उन्हें अपने रूपका दर्शन कराया और आत्म-तत्त्वके ज्ञानके लिये उन्हें परम सत्य परमार्थ वस्तुका उपदेश किया (वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ)॥ ४॥✎ 171

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #171 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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