श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अथोरुधासृजन्मायां योगमायेश्‍वरे हरौ।

यां विलोक्य प्रजास्त्रस्ता मेनिरेऽस्योपसंयमम्॥ १७

athorudhāsṛjanmāyāṃ yogamāyeśvare harau|

yāṃ vilokya prajāstrastā menire'syopasaṃyamam|| 17

अर्थ

तब वह महामायावी दैत्य मायापति श्रीहरिपर अनेक प्रकारकी मायाओंका प्रयोग करने लगा, जिन्हें देखकर सभी प्रजा बहुत डर गयी और समझने लगी कि अब संसारका प्रलय होनेवाला है॥ १७॥✎ 286 287

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #286 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #287 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें