श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

एतावत्येव शुश्रूषा कार्या पितरि पुत्रकैः।

बाढमित्यनुमन्येत गौरवेण गुरोर्वचः॥ १३

etāvatyeva śuśrūṣā kāryā pitari putrakaiḥ|

bāḍhamityanumanyeta gauraveṇa gurorvacaḥ|| 13

अर्थ

पुत्रोंको अपने पिताकी सबसे बड़ी सेवा यही करनी चाहिये कि ‘जो आज्ञा’ ऐसा कहकर आदरपूर्वक उनके आदेशको स्वीकार करें॥ १३॥✎ 309 1596

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #309 शब्दोंके बीचका स्थान: बाल,कमल-जैसे → बाल, कमल-जैसे
  • #1596 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्कपट-भावसे → निष्कपटभावसे

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