वे चित्तको उन्हींकी ओर लगाकर हाथ जोड़ अति मधुर और सुन्दर भावपूर्ण वचनोंमें लोकमें सबसे बड़े उन तीनों देवोंकी स्तुति करने लगे॥ २६॥
चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्नस्तावीत्संहताञ्जलिः।
श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयसः॥ २६
वे चित्तको उन्हींकी ओर लगाकर हाथ जोड़ अति मधुर और सुन्दर भावपूर्ण वचनोंमें लोकमें सबसे बड़े उन तीनों देवोंकी स्तुति करने लगे॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 407) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/26/