श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अत्रिरुवाच

विश्वोद्भवस्थितिलयेषु विभज्यमानै-

र्मायागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहाः।

ते ब्रह्मविष्णुगिरिशाः प्रणतोऽस्म्यहं व-

स्तेभ्यः क एव भवतां म इहोपहूतः॥ २७

viśvodbhavasthitilayeṣu vibhajyamānai-

rmāyāguṇairanuyugaṃ vigṛhītadehāḥ|

te brahmaviṣṇugiriśāḥ praṇato'smyahaṃ va-

stebhyaḥ ka eva bhavatāṃ ma ihopahūtaḥ|| 27

अर्थ

अत्रि मुनिने कहा—भगवन्! प्रत्येक कल्पके आरम्भमें जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके लिये जो मायाके सत्त्वादि तीनों गुणोंका विभाग करके भिन्‍न-भिन्‍न शरीर धारण करते हैं—वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आप ही हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कहिये—मैंने जिनको बुलाया था, आपमेंसे वे कौन महानुभाव हैं?॥ २७॥

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