सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम्॥ ३०
yathā kṛtaste saṅkalpo bhāvyaṃ tenaiva nānyathā|
satsaṅkalpasya te brahman yadvai dhyāyati te vayam|| 30
अर्थ
देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! तुम सत्यसंकल्प हो। अतः तुमने जैसा संकल्प किया था, वही होना चाहिये। उससे विपरीत कैसे हो सकता था? तुम जिस ‘जगदीश्वर’ का ध्यान करते थे, वह हम तीनों ही हैं॥ ३०॥
यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा।
सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम्॥ ३०
देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! तुम सत्यसंकल्प हो। अतः तुमने जैसा संकल्प किया था, वही होना चाहिये। उससे विपरीत कैसे हो सकता था? तुम जिस ‘जगदीश्वर’ का ध्यान करते थे, वह हम तीनों ही हैं॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 408) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/30/