श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.47

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

प्रसूतिं मानवीं दक्ष उपयेमे ह्यजात्मजः।

तस्यां ससर्ज दुहितॄः षोडशामललोचनाः॥ ४७ ✎ 1017

prasūtiṃ mānavīṃ dakṣa upayeme hyajātmajaḥ|

tasyāṃ sasarja duhitṝḥ ṣoḍaśāmalalocanāḥ|| 47

अर्थ

ब्रह्माजीके पुत्र दक्षप्रजापतिने मनुनन्दिनी प्रसूतिसे विवाह किया। उससे उन्होंने सुन्दर नेत्रोंवाली सोलह कन्याएँ उत्पन्‍न कीं॥ ४७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1017 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दुहितृ: → दुहितॄः

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