श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.48

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

त्रयोदशादाद्धर्माय तथैकामग्नये विभुः।

पितृभ्य एकां युक्तेभ्यो भवायैकां भवच्छिदे॥ ४८

trayodaśādāddharmāya tathaikāmagnaye vibhuḥ|

pitṛbhya ekāṃ yuktebhyo bhavāyaikāṃ bhavacchide|| 48

अर्थ

भगवान् दक्षने उनमेंसे तेरह धर्मको, एक अग्‍निको, एक समस्त पितृगणको और एक संसारका संहार करनेवाले तथा जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले भगवान् शंकरको दी॥ ४८॥

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