श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रद्धासूत शुभं मैत्री प्रसादमभयं दया।

शान्तिः सुखं मुदं तुष्टिः स्मयं पुष्टिरसूयत॥ ५०

śraddhāsūta śubhaṃ maitrī prasādamabhayaṃ dayā|

śāntiḥ sukhaṃ mudaṃ tuṣṭiḥ smayaṃ puṣṭirasūyata|| 50

अर्थ

इनमेंसे श्रद्धाने शुभ, मैत्रीने प्रसाद, दयाने अभय, शान्तिने सुख, तुष्टिने मोद और पुष्टिने अहंकारको जन्म दिया॥ ५०॥✎ 356

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #356 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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