श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

योगं क्रियोन्‍नतिर्दर्पमर्थं बुद्धिरसूयत।

मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम्॥ ५१

yogaṃ kriyonnatirdarpamarthaṃ buddhirasūyata|

medhā smṛtiṃ titikṣā tu kṣemaṃ hrīḥ praśrayaṃ sutam|| 51

अर्थ

क्रियाने योग, उन्‍नतिने दर्प, बुद्धिने अर्थ, मेधाने स्मृति, तितिक्षाने क्षेम और ह्री (लज्जा)-ने प्रश्रय (विनय) नामक पुत्र उत्पन्‍न किया॥ ५१॥✎ 356

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #356 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें