श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.10.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

इति ब्रुवंश्चित्ररथः स्वसारथिं

यत्तः परेषां प्रतियोगशङ्कितः।

शुश्राव शब्दं जलधेरिवेरितं

नभस्वतो दिक्षु रजोऽन्वदृश्यत॥ २२

iti bruvaṃścitrarathaḥ svasārathiṃ

yattaḥ pareṣāṃ pratiyogaśaṅkitaḥ|

śuśrāva śabdaṃ jaladheriveritaṃ

nabhasvato dikṣu rajo'nvadṛśyata|| 22

अर्थ

नरश्रेष्ठ ध्रुवजीने देखा कि उस विस्तृत रणभूमिमें अब एक भी शत्रु अस्त्र-शस्त्र लिये उनके सामने नहीं है, तो उनकी इच्छा अलकापुरी देखनेकी हुई; किन्तु वे पुरीके भीतर नहीं गये ‘ये मायावी क्या करना चाहते हैं इस बातका मनुष्यको पता नहीं लग सकता’ सारथिसे इस प्रकार कहकर वे उस विचित्र रथमें बैठे रहे तथा शत्रुके नवीन आक्रमणकी आशंकासे सावधान हो गये। इतनेमें ही उन्हें समुद्रकी गर्जनाके समान आँधीका भीषण शब्द सुनायी दिया तथा दिशाओंमें उठती हुई धूल भी दिखायी दी॥ २१-२२॥

यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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