पुरुषश्रेष्ठ! निर्गुण परमात्मा तो इनमें केवल निमित्तमात्र है; उसके आश्रयसे यह कार्यकारणात्मक जगत् उसी प्रकार भ्रमता रहता है, जैसे चुम्बकके आश्रयसे लोहा॥ १७॥✎ 379380
निमित्तमात्रं तत्रासीन्निर्गुणः पुरुषर्षभः।
व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत्॥ १७
पुरुषश्रेष्ठ! निर्गुण परमात्मा तो इनमें केवल निमित्तमात्र है; उसके आश्रयसे यह कार्यकारणात्मक जगत् उसी प्रकार भ्रमता रहता है, जैसे चुम्बकके आश्रयसे लोहा॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 465) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)