श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

एवं प्रवर्तते सर्गः स्थितिः संयम एव च।

गुणव्यतिकराद्राजन् मायया परमात्मनः॥ १६

evaṃ pravartate sargaḥ sthitiḥ saṃyama eva ca|

guṇavyatikarādrājan māyayā paramātmanaḥ|| 16

अर्थ

ध्रुव! इस प्रकार भगवान्‌की मायासे सत्त्वादि गुणोंमें न्यूनाधिकभाव होनेसे ही जैसे भूतोंद्वारा शरीरोंकी रचना होती है, वैसे ही उनकी स्थिति और प्रलय भी होते हैं॥ १६॥✎ 379 380

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #379 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #380 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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