na budhastadvaśaṃ gacchedicchannabhayamātmanaḥ|| 32
अर्थ
क्रोधके वशीभूत हुए पुरुषसे सभी लोगोंको बड़ा भय होता है; इसलिये जो बुद्धिमान् पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणीको भय न हो और मुझे भी किसीसे भय न हो, उसे क्रोधके वशमें कभी न होना चाहिये॥ ३२॥
येनोपसृष्टात्पुरुषाल्लोक उद्विजते भृशम्।
न बुधस्तद्वशं गच्छेदिच्छन्नभयमात्मनः॥ ३२
क्रोधके वशीभूत हुए पुरुषसे सभी लोगोंको बड़ा भय होता है; इसलिये जो बुद्धिमान् पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणीको भय न हो और मुझे भी किसीसे भय न हो, उसे क्रोधके वशमें कभी न होना चाहिये॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 467) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/32/