श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अथ द्वादशोऽध्यायः

ध्रुवजीको कुबेरका वरदान और विष्णुलोककी प्राप्ति

मैत्रेय उवाच

ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्ध्य वैशसा-

दपेतमन्युं भगवान् धनेश्‍वरः।

तत्रागतश्चारणयक्षकिन्‍नरैः

संस्तूयमानोऽभ्यवदत्कृतांजलिम्॥ १

dhruvaṃ nivṛttaṃ pratibuddhya vaiśasā-

dapetamanyuṃ bhagavān dhaneśvaraḥ|

tatrāgataścāraṇayakṣakinnaraiḥ

saṃstūyamāno'bhyavadatkṛtāṃjalim|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ध्रुवका क्रोध शान्त हो गया है और वे यक्षोंके वधसे निवृत्त हो गये हैं, यह जानकर भगवान् कुबेर वहाँ आये। उस समय यक्ष, चारण और किन्‍नरलोग उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही ध्रुवजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब कुबेरने कहा॥ १॥

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