॥ श्रीहरिः ॥
भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ।
यस्त्वं पितामहादेशाद्वैरं दुस्त्यजमत्यजः॥ २
bho bhoḥ kṣatriyadāyāda parituṣṭo'smi te'nagha|
yastvaṃ pitāmahādeśādvairaṃ dustyajamatyajaḥ|| 2
अर्थ
श्रीकुबेरजी बोले—शुद्धहृदय क्षत्रियकुमार! तुमने अपने दादाके उपदेशसे ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग दिया; इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ २॥
भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ।
यस्त्वं पितामहादेशाद्वैरं दुस्त्यजमत्यजः॥ २
श्रीकुबेरजी बोले—शुद्धहृदय क्षत्रियकुमार! तुमने अपने दादाके उपदेशसे ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग दिया; इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 467) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/2/